Jaivik Khad Banane Ki Vidhi

Jaivik Khad Banane Ki Vidhi

जैविक खाद निर्माण विधियां
• जैविक खाद का परिचय-
खेत में जैविक खादों के उपयोग से मृदा की अवस्था में सुधार होता है व वायु संचार में वृद्धि होती है जिससे पौधे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण अच्छे से करते हैं और हमें अच्छी पैदावार देते हैं
• जैविक खाद के भूमि में लाभ-

1.मृदा की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि होती है
2.मृदा में सिंचाई की कम जरूरत होती है
3.पौधे हमें अच्छी पैदावार देते हैं
4.लागत कम लगती है वह किसानों की आय में भी वृद्धि होती है

• जैविक खाद बनाने की विधि

1.नाडेप कम्पोस्ट विधि
2.गोबर खाद बनने की विधि
3.वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि

Jaivik Khad Banane Ki Vidhi

1.नाडेप कम्पोस्ट विधि
नाडेप कम्पोस्ट विधि विकास भारत के महाराष्ट्र प्रदेश के नारायणराव पडरी पांडे के द्वारा किया गया था यह विधि पश्चिम भारत में कृषकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है अब इस विधि का प्रसार पूरे भारत में होता जा रहा है
इस विधि में एक साधारण सास्ता का आयताकार टाका बनाया जाता है इसका आकार 10 फुट लंबा 6 फुट चौड़ा और 3 फुट ऊंचा अथवा 12 फुट लंबा 5 फुट चौड़ा 3 फुट ऊंचा 180 घन फुट रखा जाता है टाका बनाते समय ईटों के बीच पर्याप्त जगह रखी जाती है जिससे आवश्यक वायु संचार हो सके यदि कंपोस्ट बनाने के लिए कार्बनिक का अवशेष एवं अन्य पदार्थ अधिक हो तो टके की लंबाई बढ़ाई जा सकती है पर चौड़ाई 6 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए
टाका भरने की विधि
1.प्रथम परत- इस परत में 5 से 7 सेंटीमीटर मोटी परत धीमी गति से जैव पदार्थ गाय के गोबर से बिछाना चाहिए
2.दूसरी परत -दूसरी परत के रूप में अब घटित पदार्थ बिछाना चाहिए 5 से 7 सेंटीमीटर मोटी परत होनी चाहिए बिछाए हुए पदार्थ को 40% नम कर देना चाहिए
3.तीसरी परत – इसमें की केचुआ को सावधानीपूर्वक छोड़ना चाहिए कि केचुआ की संख्या 500 से 1000 इन के आकार के आधार पर हिसाब से डालना चाहिए इनके साथ कोकून भी डाल देना चाहिए
4.चौथी परत -इसमें रसोई एवं बारिक वनस्पति कचरा की 25 से 30 सेंटीमीटर मोटी परत डालकर पानी छिड़काव करना चाहिए
ऊपरी सतह -इस प्रकार की केचुआ के भोज्य पदार्थ के ढेर को जुट के पुराने बोरो से ढक देना चाहिए शोड में सदा अंधेरा बना रहना चाहिए क्योंकि अंधेरे में किचुआ ज्यादा सक्रिय रहते हैं शोड के चारों तरफ घास की टटीया या बोरे लगा देना चाहिए व आवश्यकतानुसार पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए ताकि नमी बने रहे 25 से 30 दिन के बाद इसे पलटा देना चाहिए जिससे गैस बाहर निकल जाती है और 50 से 60 दिनों में वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाती है

2.गोबर खाद तैयार करने की विज्ञान की विधि
इस विधि में 6 m ×5 m×10m अथवा 8.0m×1.8m×1.2m आकार का गड्ढा बनाया जाता है गड्ढे में पशुओं के गोबर उसकी बिछावन एवं अन्य जैविक कूड़ा कचरा को अच्छी तरह मिलाकर उसके आधे भाग में भरा जाता है जब गड्ढे का आधा भाग भर जाता है तो भूतल से लगभग 45 सेंटीमीटर ऊंचाई तक भरा जाता है तो उसे गुबदनुमा बनाकर मिट्टी के गारे से लिपाई कर दिया जाता है इस विधि में पहला ढेर बनाने के बाद दूसरे भाग की भराई की जाती है और इसके भरने तक पहले ढेर की खाद पूर्ण रूप से सड़कर इसके बाद उपयोग के हेतू तैयार हो जाती है इसके उपयोग के बाद पुनः इस भाग की भराई की जाती है और इसके भरे जाने तक दूसरे की खाद सड़कर तैयार हो जाती है इस प्रकार चक्र से एक ही गड्ढे से पूरे वर्ष भर अच्छी साड़ी गोबर खाद उपयोग के लिए बना सकते हैं इस विधि से 5 टन गोबर की खाद प्रति पशु तैयार की जा सकती है

3.वर्मी कंपोस्ट बनाने की विधि
वार्मिंग कंपोस्ट बनाने के लिए उपयुक्त स्थान जगह का उपयोग नमी एवं तापमान निर्धारित किया जा सके और चयन कर सके ऊपर एक छप्पर या अस्थाई शोड जिसकी ऊंचाई मध्य में लगभग 2.4 मीटर एवं किनारे 1.8 मीटर रखते हुए उसे स्थानीय रूप से उपलब्ध घास फूस पैरा प्लास्टिक एवं वास बली से निर्मित किया जाता है शोड की लम्बाई चौड़ाई वर्मी टैंक की संख्या पर निर्भर करती है वर्मी टैंक का मानक आकर 10m लम्बा 1m चौड़ा तथा 0.5 मीटर गहरा होता है गड्ढे की लंबाई सुविधा अनुसार कितनी भी हो सकती है लेकिन इसकी चौड़ाई 1 मीटर एवं गहराई 0.5 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए अन्यथा कार्य करने में असुविधा होगी वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए समग्रीवनस्पति कचरा जैसे की फसल अवशेष जलकुंभी केले एवं सुवबुल की पत्तियां अन्य हरि एवं सूखी पत्तियां पेड़ों की हरी शाखाएं विना फूली हुई घास सड़ी गड़ी सब्जियां और फल घरेलू कचरा एवं पशुओं का गोबर का उपयोग किया जाता है


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